वर्तमान में पत्रकारिता
डा(श्रीमती वृंदा सेनगुप्ता डा श्रीमती मंजू कश्यप
ठा. छे. ला. शा. स्नातकोत्तर महा. वि. जाँजगीर (छ.ग.)
पत्रकारिता सत्य को उ्घाटित करने का, समाज एवं देश एवं दिशा को विकास की ओर उन्मुख करने का, अज्ञानता के अधँकार को दूर ज्ञान प्रकाश करने केा सबसे अच्छा माध्यम ही शोषित, पीड़ित, व्याकुल, दीन-हीन, मलिन, जन-सामान्य की भावनाओं को चित्रित करने का उचित साधन है। पत्रकारिता के द्वारा दश एवं समाज की सेवा की जा सकती है। सबसे पहले वर्तमान में पत्रकारिता की स्थिति को समझना होगा। पत्रकारिता कितना महत्वपूर्ण हैै। किस तरह से सत्य का उद्घाटन किया जा सकता है, समस्या का समाधान प्रस्तुत किया जा सकता है। शोध पत्र में चित्रण किया है एवं यह बतलाया है किस तरह से इन अच्छे गुणों में इजाफा किया जा सकता है। साथ ही पत्रकारिता पर वर्तमान में किस तरह से नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है और वह अवगुणों को क्यों नहीं रोक पा रही है। समाचारों पर लोगों को विश्वास क्यों नहीं हो पा रहा है। मैने उक्त बिन्दुओं पर अपने विचार व्यक्त किए हैं तो सर्वथा आज की पत्रकारिता पर सही है।
प्रस्तावना
पत्रकारिता का कार्य तलवार की धार पर चलने जैसा है, फिर भी प्राचीन काल से वर्तमान तक बहुत से लोग इस कार्य की चुनौती को स्वीकार करते आये हैं। इसका स्वरूप प्राचीन काल में भी दिखाई देता है। सबसे प्रथम एवं सर्वश्रेष्ठ पत्रकार आदि किसी को माना जाये तो वह श्री नारद मुनि जी हैं। इनका वर्णन प्राचीन भारतीय गं्रथों में मिलता है। ये हमेशा निष्पक्ष भाव से पूरी, योग्यता के साथ रात-दिन परिश्रम करते हुए नयी-नयी खबर लाया करते थे, एवं देवताओं एवं राक्षसों के हड़कंप मचा दिया करते थे। उस समय के समाज में नारद जी के पत्रकारिता पर किसी को किंचित मात्र भी संदेह नहीं था।
मध्यकाल में भी इसका स्वरूप बना रहा है। सभी राजा-महाराजाओं के पास खबर लाने-ले-जाने वाले मौजूद थे। उन्हीं के माध्यम से राज कार्य चलता था एवं राजा राज्य में अपनी लोकप्रियता एवं प्रसिद्धि का पता लगताया करते थे साथ ही समय रहते समस्या का समाधान भी प्रस्तुत करते थे।
आज का युग कम्प्यूटर का युग है जिसमें पत्रकारिता की परिभाष एवं तरीका बिल्कुल बदल चुका है। आज पूरे विश्व में प्रजातंत्र है, इसके तीनों महत्वपूर्ण अंगों के बाद पत्रकारिता को चैथे स्तभ्भ के रूप में माना जाता है। वर्तमान में जनता शिक्षित होते जा रही है एवं अपने अधिकारों के प्रति सचेत भी है।
वर्तमान शिक्षित समाज में समाचार-पत्र, टी.वी., रेड़ियो, नृत्य की आवश्यकता है। इंटरनेट एवं उक्त माध्यमों पूरा विश्व एक परिवार की तरह है। दुनियाॅ के किसी भी कोने में होने वाले घटनाओं का जो किसी भी प्रकार के हो तुरंत पता चल जाता है एवं इन्हीं माध्यमों से हम तक पहुॅचता है। इन्ही के आधार पर हम अपनी विश्वास एवं मान्यताएॅ नियत करते है। इन्हीं सूचनाओं से घर, परिवार, समाज, राज्य, देश एवं पूरा विश्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है जो मानव जाति के लिए मिला-जुला परिणाम उत्पन्न कर रहा है।
वर्तमान में पत्रकारिता एक ग्लैमर, चमक-दमक से युक्त है, जो सच्चाई को प्रगट करता है लेकिन विभिन्न प्रकार के मुखौटों में कुछ अंशों को छिपाकर। समाज का विश्वास तो प्राप्त कर चुका है लेकिन अविश्वास की काली परछाईयाॅ भी है। इसके बहुत से सकारात्मक सृजनात्मक पक्ष है जिसके समाज रूपी खेत में मनुष्य रूपी फसल लहलहा रहे हैं, तो कहीं यही फसल सूखकर बिना पानी के मुरझा रहे हैं।
पत्रकारिता की परिधि अथवा क्षेत्र:-
पत्रकारिता की परिधि बहुत अधिक विस्तुत होती है। समाचार पत्र जिस स्थान से निकलता हैं, वहाॅ तो समाचार-पत्र के पत्रकार एवं संवाददता होता हैं। इसके अतिरिक्त उस समाचार पत्र के पत्रकार देश के अन्य नगरों, कस्बों और गाॅवों के अतिरिक्त विदेशों में भी होता हैं। चाल्र्स डिकन्स की कृति ‘क्रिस्मस चारकोल’’ में एक पात्र कहता है- मेरा सरोकर आदमियों में से है। समाचार-पत्र का सरोकर भी व्यक्तियों से ही होता है। पत्रकारिता के व्यवसाय का अर्थ उसकी व्यवस्था वाले पक्ष से है। व्यवस्था के अंतर्गत समाचार-पत्र का प्रसार, विज्ञापन, कच्चे माल की खरीद और मुद्रण विभाग सहित समस्त कर्मचारियों की व्यवस्था सम्मिलित होती है।
वर्तमान में पत्रकार, पत्रकारिता के व्यवसाय-पक्ष के महत्व के प्रति जागरूक एवं सजग दिखाई देते हैं। समाचार-पत्र चलाने का कार्य समाचार-पत्र उद्योग की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। आज के युग में समाचार-पत्र के व्यवसाय पक्ष पर उन्नत देशों की तुलना में कम ध्यान दिया जाता है। कोई भी समाचार-पत्र अपने पाठकों की सेवा उसी स्थिति में कर सकता है, जब उसके पास पर्याप्त धनराशि हो। जब वह अपने पाठकों की सेवा भली-भाॅति करें।
प्रसार:-
समाचार-पत्र में उसका प्रसार एवं विज्ञापन आय के दो साधन होते हैं। फिर भी समाचार-पत्र आयोग ने कहा है कि समाचार-पत्र की सफलता की प्रथम शर्त उसका प्रसार है। प्रसार का विज्ञापन से प्रत्यक्ष संबंध होता है। प्रेस आयोग ने कहा कि ‘‘प्रसार में वृद्धि होने पर विज्ञापनों से उसकी आय बढ़ती है, क्योंकि प्रसार के अधिक होने से उसकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हो जाती है और वह विज्ञापन दरें बढ़ा सकता है।’’ इसलिए प्रत्येक समाचार-पत्र विभिन्न उपाय अपना-अपना प्रसार बढ़ाने का भरसक प्रयत्न करता है। अपने आप में भी प्रसार बहुत महत्वपूर्ण होता है और अपना विज्ञापन प्रदान करने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होता है। किसी भी समाचार-पत्र को कितने विज्ञापन प्राप्त होते हैं, और किन दरों पर प्राप्त होतेे हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस समाचार-पत्र का प्रसार कितना है।
समाचार-पत्रों का प्रसार अनेक तथ्यों पर निर्भर करता है। इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण समाचार-पत्र की सम्पादकीय नीति एवं प्रस्तुतिकरण और समाचारों तथा रूपकों की साज-सज्जा है। साफ और सुरूचिपूर्ण छपाई भी एक महत्वपूर्ण कारण है। सदानंद कहा करते थे कि समाचार-पत्र की प्रथम विशेषता अच्छी छपाई है। कुछ राष्ट्रीय तथा महानगरीय समाचार-पत्रों की छपाई बहुत अधिक अच्छी होती है और उन्हें पढ़ने की इच्छा होती है।
उपसंहार:-
उक्त विवरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान में पत्रकारिता एक सजग प्रहरी के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन कर रही है। वह अपने दायित्वों एवं अधिकारों को समझ रही हैं। देश समाज को ऊॅचा उठाने में अपना सक्रिया योगदान दे रही हैं, इसलिए देश की जनता का विश्वास जीत पा रही है।
वह दिन दूर नहीं जब पत्रकारिता देश की गरीबी, शोषितों, पीड़ितों की समस्या को ईमानादारी से सामने लायेग एवं उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करेगी एवं अच्छे गुणों से युक्त होकर साहस के साथ सच्चाई का चित्रण करते हुए सोने की चिड़िया भारत को हीरों का हार पहनायेगी।
पत्रकारिता वर्तमान संदर्भ में अभी अपने पूर्ण विकास आभा को नहीं छू पायी है। इससे संकीर्णता है, तटस्थता का अभाव है। साथ ही समझ की कमी है एवं परम्परागत वैचारिक पद्धति से ऊबर नहीं पायी है।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि पत्रकारिता का क्षेत्र विषय-वस्तु, अधिकार एवं कर्तव्य आज पहले से बहुत बढ़ चुकी है। भारतीय पत्रकारिता वर्तमान में उस ऊॅचाई की ओर आरूढ़ हो रही है जो विश्व के किसी भी देश की पत्रकारिता से टक्कर ले सके।
संदर्भ सूची
1- Economics Time D of India
2- 10th Five Year Plan
3- India Statistical Abstract 2002
4- Economics Survy 07 India
5. दूरदर्शन और सामाजिक विकास, लेखक-डाॅ.जगदीश्वर चतुर्वेदी प्रकाशक श्रीमती दुर्गा डागा, सी.डी. 197 सांल्ट लेखक, कलकत्ता-700064-प्रथम संस्करण 1991 भूमिका पृष्ठ-1
6. अग्रवाल जी.के.-समाजशास्त्र साहित्यभवन पब्लिकेशन
Received on 18.07.2017 Modified on 17.09.2017
Accepted on 20.10.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2017; 5(4): 210-212 .